मूल संकेत यह विधि महर्षि पराशर ने ही बताई है। लग्न सहित सारे ग्रहों में से कारक ग्रहों की सूची बना लें। फिर सब ग्रहों की अशांत्मक स्थित से उनके अंशों का नामकरण आगे बताई जा रही विधि से कर लें। इन अंशों के नामानुसार ग्रह के फल में उतार चढ़ाव देखा जाता है। आगे कहे जा रहे द्वादशांश लग्न और विशेष लग्नों सहित सव कारक ग्रहों पर लागू हैं। इनके लिए केवल अंशों को देखना है और राशि का विचार नहीं करना है। यह एक राशि के 30 अंशों के बारह बराबर हिस्से हैं जो वर्ग कुण्डलियों में शामिल द्वादशांश (D12) कतई नहीं हैं। सब योग कारक ग्रहों व सभी मुख्य लग्नों के स्पष्ट अंशों के आधार पर उनके अंश नाम तयकर लें। हर एक राशि में 2.30 का एक एक अंश होने से कुल 12 अंश होंगे। यहां इसे वर्ग चक्रों वाला द्वादशांश समझने का भ्रम कृपया न करें। इन बारह अंशों के नाम, अंशों का विस्तार और शब्दार्थ तालिका में दिया हो रहा है। ✓इनमें 1.4.7.10 संख्यक कुबेर, किरीट, मोहन, इन्द्र नाम वाले अंश सर्वश्रेष्ठ हैं। इन नामों वाले ग्रह यदि केन्द्र में हों तो पूरा फल, ✓पतंग, मायावी, किन्नर और लीला अंश (2.6.8.11) स्व...