. #27_नक्षत्र_और_शरीर_के_अंग :
(Relation Between Nakshatra and Body Parts) :
. वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों को भी शरीर के आधार पर वर्गीकृत किया गया है ! सभी 27 नक्षत्र शरीर के किसी ना किसी अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन अंगों से सम्बंधित परेशानी भी व्यक्ति को हो जाती हैं ! जो नक्षत्र जन्म कुण्डली में पीड़ित होता है उससे सम्बंधित बीमारी व्यक्ति को होने की सम्भावना बनती है अथवा जब कोई नक्षत्र गोचर में पीड़ित अवस्था में होता है, तब उससे सम्बंधित अंग में परेशानी होने का खतरा बढ़ जाता है !
. इस लेख के माध्यम से आज हम उन सभी नक्षत्रों व उनसे सम्बंधित शरीर के अंगों के बारे में पूर्ण जानकारी देने जा रहा हूँ इससे आपके मन में उठने वाले ऐसे प्रश्नो का समाधान हो जायगा ! मेरे कुछ शिष्य अक्सर यह जानना चाहते हैं कि कौन सा नक्षत्र शरीर के किस अंग का प्रतिनिधित्व करता है ! इससे उनका भी समाधान हो जायेगा !
#अश्विनी_नक्षत्र :
अश्विनी नक्षत्र का स्वामी ग्रह केतु हैं ! यह पहला नक्षत्र है और इसलिए यह सिर के ऊपरी भाग का प्रतिनिधित्व करता है ! मस्तिष्क सम्बंधित जितनी भी बाते हैं उन सभी को अश्विनी नक्षत्र से देखा जा सकता है ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन्हीं से सम्बंधित बीमारियों का सामना व्यक्ति को करना पड़ता है !
#भरणी_नक्षत्र :
भरणी नक्षत्र दूसरे स्थान पर आने वाला नक्षत्र है और शुक्र इसके स्वामी हैं ! इसके अधिकार क्षेत्र में मस्तिष्क का अंदरूनी क्षेत्र, सिर के अंदर का भाग व आँखे आती हैं ! जन्म कुण्डली या गोचर में इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन्हीं अंगों से सम्बंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता है !
#कृत्तिका_नक्षत्र :
यह तीसरा नक्षत्र है और सूर्य इसके स्वामी हैं ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत, सिर, आँखें, मस्तिष्क, चेहरा, गर्दन, कण्ठनली, टाँसिल व निचला जबड़ा आता है ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर आपको इससे सम्बंधित बीमारी होने की सम्भावना बनती है !
#रोहिणी_नक्षत्र :
यह चौथा नक्षत्र है और इसके स्वामी चंद्रमा हैं ! इस नक्षत्र के अधिकार क्षेत्र में चेहरा, मुख, जीभ, टांसिल, गरदन, तालू, ग्रीवा, कशेरुका, अनुमस्तिष्क आते हैं ! जन्मकालीन रोहिणी नक्षत्र अथवा गोचर का यह नक्षत्र जब पीड़ित होता है तब इन अंगो में पीड़ा का अनुभव व्यक्ति को होता है !
#मृगशिरा_नक्षत्र :
यह नक्षत्र पांचवें स्थान पर आने वाला नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह मंगल है ! इस नक्षत्र के पहले व दूसरे चरण में ठोढ़ी, गाल, स्वरयंत्र, तालू, रक्त वाहिनियाँ, टांसिल, ग्रीवा की नसें आती हैं ! तीसरे व चौथे चरण में गला आता है और गले की आवाज आती है ! बाजू व कंधे आते हैं, कान आता है ! ऊपरी पसलियाँ आती हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित समस्या से जूझना पड़ता है !
#आर्द्रा_नक्षत्र :
यह छठे स्थान पर आने वाला नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह राहु हैं ! इस नक्षत्र के अधिकार में गला आता है, बाजुएँ आती है और कंधे आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित बीमारी होने की सम्भावना बनती है !
#पुनर्वसु_नक्षत्र :
यह सातवाँ नक्षत्र है और इसके स्वामी ग्रह बृहस्पति हैं ! इस नक्षत्र के पहले, दूसरे व तीसरे भाग के अधिकार में कान, गला व कंधे की हड्डियाँ आती हैं ! पुनर्वसु नक्षत्र के चौथे चरण में फेफड़े, श्वसन प्रणाली, छाती, पेट, पेट के बीच का भाग, पैंक्रियाज, जिगर तथा वक्ष आता है ! जब यह नक्षत्र पीड़ित होता है तब इस नक्षत्र से सम्बंधित भागों में बीमारी होने की सम्भावाना बनती है !
#पुष्य_नक्षत्र :
यह भचक्र का आठवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी शनि है ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत फेफ़ड़े, पेट तथा पसलियाँ आती हैं ! यदि यह नक्षत्र पीड़ित होता है तब इससे सम्बंधित शरीर के अंग में पीड़ा पहुंचती है !
#आश्लेषा_नक्षत्र :
यह नौवां नक्षत्र है और इसका स्वामी बुध है ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत फेफड़े, इसोफेगेस, जिगर, पेट का मध्य भाग, पैंक्रियाज आता है ! यदि यह नक्षत्र पीड़ित होता है तब इन अंगों से जुड़ी परेशानियाँ व्यक्ति को होती हैं !
#मघा_नक्षत्र :
यह भचक्र का दसवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह केतु है ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत पीठ, दिल, रीढ़ की हड्डी, स्प्लीन, महाधमनी, मेरुदण्ड का पृष्ठीय भाग आते हैं ! जब भी यह नक्षत्र पीड़ित होगा तब व्यक्ति को इन्ही स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं से होकर गुजरना पड़ेगा !
#पूर्वाफाल्गुनी_नक्षत्र :
यह ग्यारहवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह शुक्र है ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत मेरुदंड व दिल आता है और जब भी यह नक्षत्र पीड़ित होता है तब इन दोनो से सम्बंधित शारीरिक समस्या हो सकती है !
#उत्तराफाल्गुनी_नक्षत्र :
यह बारहवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी सूर्य है ! इस नक्षत्र के पहले चरण में मेरुदंड आता है, दूसरे, तीसरे व चौथे चरण में आंते आती है, अंतड़ियाँ आती हैं और इसका निचला भाग आता है ! जन्म कुण्डली में इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इनसे सम्बंधित स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओ का सामना करना पड़ सकता है !
#हस्त_नक्षत्र :
यह तेरहवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी चंद्रमा है ! इसके अधिकार में आंते, अंतड़ियाँ, अंत:स्त्राव ग्रंथियाँ, इंजाइम्स आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर व्यक्ति को इन अंगों से सम्बंधित कष्ट होने की सम्भावना बनती है !
#चित्रा_नक्षत्र :
यह भचक्र का चौदहवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी मंगल ग्रह है ! इस नक्षत्र के पहले व दूसरे चरण में उदर का निचला भाग आता है, तीसरे व चौथे चरण में गुर्दे, कटि क्षेत्र, हर्निया, मेरुदंड का निचला भाग, नसों की गति आदि आती है ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन्हीं अंगों में कष्ट होता है !
#स्वाति_नक्षत्र :
यह भचक्र का पंद्रहवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह राहु है ! त्वचा, गॉल ब्लैडर, गुर्दे, मूत्रवाहिनी इस नक्षत्र के अधिकार क्षेत्र में आती हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर व्यक्ति को इन अंगों से जुड़ी बीमारी होने की सम्भावना बनती है !
#विशाखा_नक्षत्र :
यह सोलहवाँ नक्षत्र है और इसके स्वामी बृहस्पति हैं ! इस नक्षत्र के पहले, दूसरे व तीसरे चरण में पेट का निचला हिस्सा, गॉल ब्लैडर के आसपास के अंग, गुर्दा, पैंक्रियाज सम्बंधित ग्रंथि आती है ! चौथे चरण में ब्लैडर, मूत्रमार्ग, गुदा, गुप्तांग तथा प्रौस्टेट ग्रंथि आती है !
#अनुराधा_नक्षत्र :
यह भचक्र का सत्रहवाँ नक्षत्र है और शनि इसका स्वामी है ! ब्लैडर, मलाशय, गुप्तांग, गुप्तांगों के पास की हड्डियाँ, नाक की हड्डियाँ आदि सभी इस नक्षत्र के अंदर आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित समस्याओं से होकर गुजरना पड़ता है !
#ज्येष्ठा_नक्षत्र :
यह भचक्र का अठारहवाँ नक्षत्र है और बुध इसका स्वामी है ! गुदा, जननेन्द्रियाँ, बृहदआंत्र, अंडाशय तथा गर्भाशय ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतर्गत आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर व्यक्ति को इन अंगों से सम्बंधित रोग होने की सम्भावना बनती है !
#मूल_नक्षत्र :
यह भचक्र का उन्नीसवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह बुध है ! इस नक्षत्र के अंतर्गत कूल्हे, जांघे, गठिया की नसें, ऊर्ध्वस्थि, श्रोंणिफलक आदि अंग आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से जुड़े रोग हो सकते हैं !
#पूर्वाषाढ़ा_नक्षत्र :
यह भचक्र का बीसवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह शुक्र है ! इसके अन्तर्गत कूल्हे, जांघे, नसें, श्रोणीय रक्त ग्रंथियाँ, मेरुदंड का सेक्रमी क्षेत्र आदि अंग आते हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगो से सम्बंधित रोग होने की सम्भावना बनती है !
#उत्तराषाढ़ा_नक्षत्र :
यह इक्कीसवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह सूर्य है ! इस नक्षत्र के पहले चरण में जांघे आती हैं, ऊर्वस्थि रक्त वाहिनियाँ आती हैं ! इस नक्षत्र के दूसरे, तीसरे व चौथे चरण में घुटने व त्वचा आती हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित रोगों का सामना करना पड़ सकता है !
#श्रवण_नक्षत्र :
यह भचक्र का बाईसवाँ नक्षत्र है और चंद्रमा इसका स्वामी है ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत घुटने, लसिका वाहिनियाँ तथा त्वचा आती है ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित रोग होने की सम्भावना बनती है !
#धनिष्ठा_नक्षत्र :
यह भचक्र का तेईसवाँ नक्षत्र है और मंगल इसका स्वामी है ! इस नक्षत्र के पहले व दूसरे चरण में घुटने की ऊपर की हड्डी आती है जो टोपी के समान दिखायी देती है ! तीसरे व चतुर्थ चरण में टखने, टखने और घुटनों के बीच का भाग आता है ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों में परेशानी का अनुभव होता है !
#शतभिषा_नक्षत्र :
यह भचक्र का चौबीसवाँ नक्षत्र है और इसका स्वामी राहु है ! घुटनों व टखनों के बीच का भाग, पैर की नलियों की मांस पेशियाँ इस नक्षत्र के अन्तर्गत आती हैं ! जब यह नक्षत्र पीड़ित होता है तब इन अंगों से सम्बंधित रोग होने की सम्भावना बनती है !
#पूर्वाभाद्रपद_नक्षत्र :
यह भचक्र का पच्चीसवाँ नक्षत्र है और बृहस्पति इसके स्वामी हैं ! इस नक्षत्र के पहले, दूसरे व तीसरे चरण में टखने आते हैं, चतुर्थ चरण में पंजे व पांव की अंगुलियाँ आती हैं ! जब भी यह नक्षत्र पीड़ित होगा तब इन अंगों से सम्बंधित परेशानियों का सामना करना पड़ेगा !
#उत्तराभाद्रपद_नक्षत्र :
यह भचक्र का छब्बीसवाँ नक्षत्र है और शनि इसके स्वामी हैं ! इस नक्षत्र के अन्तर्गत पैर के पंजे आते हैं ! जन्म कुण्डली में अथवा गोचर में इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर व्यक्ति को पंजों से सम्बंधित परेशानी से गुजरना पड़ सकता है !
#रेवती_नक्षत्र :
यह भचक्र का सत्ताईसवाँ व अंतिम नक्षत्र है और इसका स्वामी ग्रह बुध है ! इस नक्षत्र के अधिकार में पंजे व पैर की अंगुलियाँ आती हैं ! इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर इन अंगों से सम्बंधित बीमारी हो सकती है !
ज्योतिर्विद पंडित डी.एन. पाण्डेय #प्रयागराज !
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