आपात काल के दौरान भोपाल केन्द्रीय कारागार में संघ स्वयं सेवक, जनसंघ कार्यकर्ताओं के साथ जमायते इस्लामी के लोग भी वंदी थे | जमायते इस्लामी के प्रदेश अध्यक्ष मौलाना इनामुर्रहमान को ठाकरे जी ने आग्रह पूर्वक अपनी बैरक में ही रखा | वहां विद्यार्थी परिषद् के तत्कालीन संगठन मंत्री श्री सूर्यकांत जी केलकर की इन मौलाना साहब से अच्छी खासी मित्रता हो गई | वे साथ साथ भोजन उपरांत टहलते, दिन में शतरंज की बाजी लगाते, हंसते बतियाते | एक दिन मजाक मजाक में दोनों में गंभीर चर्चा छिड़ गई | केलकर जी ने कहा कि मैं " या इलाह इल्लिल्लाह मोहम्मद रसूल लिल्लाह" अर्थात "इश्वर एक है, व्यापक है मोहम्मद साहब पैगम्बर है मार्ग दर्शक हैं", इसमें यकीन करता हूँ | उन्होंने मजाक में ही पूछ लिया कि अब बताइये कि मैं भी मुसलमान हूँ कि नहीं ?
मौलवी साहब ने आँखे तरेर कर पूछा कि इस सवाल के पीछे तुम्हारा मकसद क्या है ?
केलकर जी ने हंसते हुए कहा कि कुछ नहीं मैं केवल यह कह रहा हूँ कि जैसे अल्लाह ताला ने भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाने मोहम्मद साहब को भेजा, बैसे ही और महापुरुषों को भी भेजा | तुम उन्हें भी पैगम्बर क्यों नहीं मान सकते ?
मौलवी साहब ने नाराज लहजे मैं कहा कि क्या काफिराना बात करते हो |
अब केलकर जी भी गंभीर हो गए और बोले कि आपको मेरी बात काफिराना लगती है, इसका अर्थ है कि आपकी नजर में मैं काफिर हुआ |
मौलवी साहब का जबाब था " यकीनन " |
केलकर जी ने आगे कहा कि आपके यहाँ तो कुरआन के अनुसार काफिरों के लिए सजाये मौत तजबीज की गई है, जबकि आप तो हमारे साथ रहते, खाते, पीते, हंसते बतियाते हो |
मौलवी का जबाब केलकर जी को हैरत मैं डालने बाला था | जबाब था - जब हमारी हुकूमत होगी तब यही होगा |
गुस्से मैं सूर्यकांत जी ने कहा कि अगर यही व्यवहार हम आपके साथ करें तो आपको कैसा लगेगा ?
मौलवी ने पूरी ढिठाई के साथ कहा - नहीं आप एसा नहीं कर सकते | बताइये आपके किस धर्म ग्रन्थ मैं एसा करने के लिए लिखा हुआ है ?
सूर्यकांत जी तो कोई जबाब नहीं दे पाए |
क्या आपके पास कोई जबाब है ?
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