शनि द्वारा विभिन्न राशियों पर साढ़ेसाती, ढैय्या, विष दोष की तरह ही कण्टक-शनि दोष भी कुछ विशेष स्थितियों में प्रभावी होता है, जो अपनी स्थिति के अनुसार जातक को अशुभ फल ही देता है ! वैसे भी कण्टक का शाब्दिक अर्थ काँटा होता है, मतलब इस स्थिति के उत्पन्न होने पर काँटा के समान कुछ चुभने वाली स्थितियाँ बन सकती हैं ! परन्तु चन्द्रमा की डिग्री व नक्षत्र, चरण बदलने पर भी इसका असर अलग हो जाता है, यदि उन स्थितियों में चन्द्रमा अच्छी व मजबूत स्थिति में होगा तब इस दोष का प्रभाव नगण्य होगा । आज हम इसी कण्टक शनि दोष के बारे में जानकारी देना चाहेंगे ।
कण्टक शनि दोष का मतलब है, शनि गोचर में किस स्थिति में होने पर साढ़ेसाती, ढैय्या व विष दोष के अतिरिक्त भी कष्टकारक हो जाता है, जिसे दक्षिण भारत में कण्टक शनि (काँटे के समान कष्टकारक पीड़ा देने वाला) दोष के नाम से जाना जाता है !
. यहाँ हम बताना चाहेंगे कि कुण्डली में शनि के दो स्थितियों में विराजमान होने पर कंटक शनि दोष उत्पन्न होता है और जातक को कष्टकारक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर आर्थिक तंगी व शारीरिक समस्या से कष्ट होना ! वह दो स्थितियां इस प्रकार हैं —
1 - जब कुण्डली में गोचर का शनि चन्द्रमा से केन्द्र में स्थित हो ।
2 - जब कुण्डली में गोचर का शनि चन्द्रमा से चतुर्थ या अष्टम भाव में स्थित हो ।
. इन दोनो ही स्थितियों में शनि का चन्द्रमा के साथ सम्बन्ध बनने पर इसे कण्टक शनि स्थिति कहते हैं और जातक को आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ता है, अथवा शारीरिक पीड़ा से दो चार होना पड़ सकता है ।
उदाहरण के लिए शनि इस समय मकर राशि में स्थित हैं और 29 अप्रैल 2022 को कुम्भ राशि में स्थान परिवर्तन करेंगे ! तब उस समय वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि में चन्द्रमा के होने पर शनि से केन्द्र में होंगे तथा जब चन्द्रमा, कर्क अथवा वृश्चिक राशि में स्थित होंगे तब 4th व 8th भाव में स्थित होने के कारण कण्टक शनि दोष बनेगा ।
2 - जबकि अभी शनि मकर राशि में हैं, अतः चन्द्रमा के मेष, कर्क, तुला, मकर राशि में स्थित होने पर शनि से केन्द्र में रहेंगे और तुला व मिथुन राशि में स्थित होने पर 4th व 8th भाव में स्थित होने से उन राशि के जातको पर कण्टक-शनि दोष का प्रभाव पड़ रहा है ।
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