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वैवाहिक संबंधो पर ग्रहों का प्रभाव

ज्योतिष एक अथाह सागर है जो जीवन के हर पहलू पर रोशनी डालता है !  एक अच्छे ज्योतिषी को ज्योंतिष की सभी शाखाओं का अध्ययन करना चाहिए और अपने अनुभव से उनका प्रयोग कुण्डली पर करना चाहिए !  पाराशर ज्योतिष के अनुसार कुण्डली देखते  समय जन्म कुण्डली,वर्ग कुण्डली, दशा,  नक्षत्र और गोचर का भी विश्लेषण आवश्यक होता है ! सभी वर्गों में नवांश को अत्यधिक महत्व दिया गया है, इसी वजह से आज का यह लेख नवांश पर आधारित है ! किस प्रकार नवांश कुंडली से आप अपने और अपने जीवनसाथी के बीच अंतरंग सम्बंधों की  ज्योंतिषीय परिणाम देख सकते हैं !

जैसा की ज्योतिष के सभी जानकारों को ज्ञात है कि सप्तम भाव, सप्तम भाव का स्वामी और शुक्र से वैवाहिक जीवन का विचार किया जाता है ! इन भावों के अलावा द्वादश भाव पति पत्नी के अंतरंग सम्बंधों के  लिए, दूसरा भाव कुटुम्ब के लिए, चौथा भाव परिवार के लिए भी देखे जाते हैं ! यदि इन  भावों का सम्बंध या इनके स्वामियों का सम्बंध मंगल, शनि, राहु एवं केतु से हो तब वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं होता है !

यदि शुक्र, मेष,सिंह, धनु, वृश्चिक राशि में स्थित हों या नीच का हो और मंगल राहु केतु या शनि के साथ हों तब यह व्यक्ति में अत्यधिक सेक्स इच्छा उत्पन्न करते है ! कई बार व्यक्ति विवाह की मर्यादा को तोड़कर विवाह के बाद बाहर ही सम्बंध बनाता फिरता है !  निश्चय ही यह अच्छी बात नहीं है, परन्तु  ऐसे कौन से योग हैं जिसके कारण व्यक्ति में इस तरह की इच्छा उत्पन्न होती है यह जानना भी आवश्यक है ! 

 .     आइए जानते हैं की ज्योतिष ग्रंथों में इसके बारे में क्या बताया गया है ! विवाह से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने के लिए पहले तो व्यक्ति  बौद्धिक रूप से तैयार होना चाहिए उसकी बुद्धि ऐसी होनी चाहिए जो उसको इस ओर धकेल रही हो ! पंचम भाव और चंद्रमा दर्शाता है कि व्यक्ति की सोच क्या है, तब यदि आपकी कुण्डली में पंचम भाव पर  मंगल, शनि, राहु का प्रभाव है और चंद्रमा भी पीड़ित हैं तब ऐसी सोच अवश्य उत्पन्न होती है !  यही योग यदि नवांश में बन जाए तब वह इस तरह की सोच पर मोहर लगा देते हैं !

अब बात करते हैं ऐसे कुछ लोगों की जो ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में दिए हुए है !

नवांश कुंडली में शनि शुक्र की राशि में और शुक्र शनि की राशि में हों तब महिला की शारीरिक भूख अधिक होती है !

नवांश कुण्डली में शुक्र मंगल की राशि में हों  और मंगल शुक्र की राशि में तब ऐसे व्यक्ति अपने जीवनसाथी के अलावा बाहर शारीरिक  सम्बंध बनाने में नहीं हिचकिचाते हैं !

शुक्र मंगल आत्मकारक की नवांश राशि से बारहवें भाव में हों तब ऐसा व्यक्ति चरित्रहीन होता है !

केतु आत्मकारक की नवांश राशि से नवम भाव में हों तब वृद्धावस्था तक भी ऐसा व्यक्ति, पर पुरुष या पर स्त्री के बारे में सोचता रहता है !

शुक्र सभी वर्गों में केवल मंगल या शनि की राशियों में ही हों तब तो व्यक्ति निश्चित रूप से चरित्रहीन होता ही है !

नवांश कुण्डली में चंद्रमा के दोनों ओर शनि  और मंगल हों और पापकर्तरी योग बन रहा हो तब पति-पत्नी दोनों ही व्याभिचारी हो सकते हैं !

जन्म कुण्डली का सप्तम का स्वामी नवांश  कुण्डली में बुद्ध की राशि में बैठा हो और बुद्ध की उसपर दृष्टि भी हो तब जातक का जीवन साथी द्विअर्थी बातें करते हैं और लोगों को रिझाने का काम करते हैं !

        जैसा की आप सबको भी ज्ञात है कि पंचम और सप्तम भाव से संतान प्राप्ति का विचार करते हैं !  यदि दोनों का सम्बंध  छठे भाव से हो जाए तब व्यक्ति विशेष में  प्रजनन शक्ति कम हो जाती है ! "जातक अलंकार" के अनुसार यदि शुक्र मंगल की राशियों में हो तब वह अपने जीवनसाथी को सेक्स सम्बंधों में सन्तुष्ट नहीं कर पाता है ! इसी तरह यदि शनि शुक्र का योग दशम भाव में हो तब व्यक्ति में नपुंसकता के योग बनते हैं !  'संकेत निधि' के अनुसार यदि शुक्र चंद्रमा की युति नवम भाव में हो तब ऐसे जातक की पत्नी कुटिल होती है !

 कुण्डली के चौथे भाव से व्यक्ति के चरित्र का  पता लगाया जाता है और बार-बार सेक्स सम्बंधों में जातक की रुचि को दर्शाता है, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन दोनों  भावों का गहन विश्लेषण आवश्यक होता है !
         हमारा आप सब से अनुरोध है कि यह नियम सीधे कुण्डलियों पर ना लगाएं अपितु  पूरी कुण्डली का विश्लेषण करने के बाद ही  ऐसे लोगों की मनोदशा पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए !

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