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सीमान्त होने का दंश

 सीमांत होने पर इसका दंश उस क्षेत्र को झेलना ही पड़ता है । अब सीमांत चाहे खेत का हो, गाँव का हो, तहसील का हो, जिला का हो, प्रदेश का हो या देश का अथवा किसी नक्षत्र व राशि के बीच फँसे चरण का सीमांत क्षेत्र हो वहाँ तक विकास की धारा और प्रकाश पहुँचते पहुँचते ही पहुँचती है और यदि पहुँची भी तो अपर्याप्त रूप से पहुँचती है । हम सबने इस बात का पूर्ण अनुभव करते रहते हैं । खेत के आखिरी छोर की सिंचाई, देखभाल उतनी अच्छी नहीं हो पाती जितनी मध्य भाग की, परिणाम स्वरूप वहाँ की उपज भी प्रभावित होती है ।

.     ठीक इसी तरह गण्डमूल नक्षत्र तो कहने के लिए बदनाम हैं, कुछ ऐसे भी नक्षत्र व चरण हैं जो न इधर के हैं और न उधर के अपने मूल स्वभाव के विपरीत अलग जगह फँस गये होते हैं, फलस्वरूप उस नक्षत्र के उस चरण को भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है और उपेक्षा का शिकार बन कर अविकसित रह जाते हैं, जिससे उनमें कुछ विकार आना स्वाभाविक हो जाता है ।

.     हम यहाँ बात कर रहे हैं कुछ नक्षत्रों के प्रथम चरण की वहीं कुछ नक्षत्रों के अंतिम चरण की जो अपने नक्षत्र के मूल राशि में न रहकर दूसरी राशि के सीमांत चरण बन जाते हैं ! इस चरण में जन्म लेने वाले जातक निश्चित रूप से अपेक्षाकृत कमजोर मनःस्थिति के एवं सीमांत होने का दंश झेलने को मजबूर होते हैं ! उन्हे जीवन में अनेकों प्रकार के संघर्ष झेलने पड़ते हैं । आइये हम इनके बारे में विस्तार से जानते हैं ।

1 - #कृतिका_नक्षत्र_का_प्रथम_चरण :— 

यह चरण मेष राशि में सम्मिलित है, और 'अ' अक्षर धारित करता है ! जबकि इस नक्षत्र के शेष तीन चरण वृष राशि में चले जाते हैं और मुख्य धारा में होने के कारण प्रथम चरण के 'अ' अक्षर से सर्वथा भिन्न गुण धर्म रखते हैं ।

2 - #पुनर्वसु_नक्षत्र_का_चतुर्थ_चरण :— 

. पुनर्वसु नक्षत्र का यह चरण कर्क राशि में सम्मिलित है और पुष्य व आश्लेषा नक्षत्र के स्वभाव से पूर्णतः भिन्न व उपेक्षित है ! पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम चरण होने और शेष तीन चरण से अलग होकर कर्क राशि में चले जाने से अलग थलग पड़ कर अपने को उपेक्षित पाता है । 'ही' अक्षर का प्रतिनिधित्व करता है परन्तु पुष्य नक्षत्र के साथ इसका कोई तालमेल नहीं है ।

3 -#उत्तराफाल्गुनी_नक्षत्र_का_प्रथम_चरण :—  
.     उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का यह चरण सिंह राशि में सम्मिलित है और इसके अन्य तीन चरण कन्या राशि में चले जाते हैं । इस प्रकार सिंह राशि के अंतिम छोर पर स्थित होने के कारण यह चरण सिंह राशि के अन्य चरणों के समान प्रभावी नहीं है ! इस नक्षत्र से सम्बन्धित 'टे' अक्षर सिंह राशि में पड़ता है, शेष कन्या राशि में चले जाते हैं ! इस चरण में जन्मे जातक समस्याओं से घिरे रहते हैं ।

4 - #बिशाखा_नक्षत्र_का_चतुर्थ_चरण :— 

.     यह चरण वृश्चिक राशि में सम्मिलित है और अपने अन्य तीन चरणों के राशि स्वामी शुक्र से भिन्न क्रूर ग्रह मंगल की राशि वृश्चिक का प्रथम चरण बनता है,  इस चरण में 'तो' अक्षर आता है । वृश्चिक राशि के प्रारम्भ में दूसरी राशी के साथ सम्मिलित होने के कारण इसे प्रारम्भिक कठिनाइयों से दो चार होना स्वाभाविक है ! इस नक्षत्र में जन्मी कन्यायें अपने ससुराल वालों के लिए घातक होती हैं और स्वयं के उपेक्षित होने का दंश अवश्य झेलती हैं ।

5 - #उत्तराषाढ़ा_नक्षत्र_का_प्रथम_चरण :— 

.     यह चरण धनु राशि में सम्मिलित है 'भे' अक्षर का प्रतिनिधित्व करता है और अशुभ मुहूर्तो व खरमास में पड़ने से पीड़ित रहता है । धनुराशि के अन्तिम छोर पर स्थित होने के कारण उपेक्षित वर्ग में आता है ।

6 - #पूर्वाभाद्रपद_का_चतुर्थ_चरण :— 

.    पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का यह चरण मीन राशि में सम्मिलित है और खरमास व अशुभ मुहूर्तों के कारण प्रारम्भिक कठिनाइयों से गुजरता है । यह 'दी' अक्षर का प्रतिनिधित्व करता है ।

.     चूँकि उपरोक्त सभी छः चरण अपने नक्षत्रों से कट कर किसी दूसरी राशि में सम्मिलित हैं अतः इनका गुणधर्म न इधर का रहता है और न उधर का, अतः यह दुष्प्रभावित रहते हैं और इन चरणों में जन्मे जातक अपने को कटा हुआ और उपेक्षित महसूस करते हैं ।

.     आप इन चरणों में जन्म लेने वाले जातकों की कुण्डली व जीवन यात्रा का विश्लेषण करके स्वयं भी इस बात की पुष्टि कर सकते हैं ,हालाँकि यह स्थितियाँ खगोलीय कारणों से उत्पन्न होती हैं ।

केदार दत्त जोशी द्वारा लिखित "मुहूर्त चिंतामणि" से इस सम्बंध में एक उदाहरण देखिए — 

"न  हन्ति  देवरं  कन्या   तुलामिश्रद्विदेवजा ।
चतुर्थ पादजा त्याज्या दुष्टा वृश्चिक पुच्छवत ।।
बिशाखा   तुलयायुक्ता   देवरस्य   शुभावहा ।
बिशाखा वृश्चिकोद्भूता, देवरं  हृन्त्यसंशयम् ।।"

"बिशाखा वृश्चिकोद्भूता हन्तिदेवरः नसंशयम् ।
तस्माद्विशाखा   चतुर्थपादे  निषेधः  इत्यर्थः।।

अर्थात जहाँ तक बिशाखा के तुला स्थित तीन चरण का प्रश्न है, उसमें जन्मी बालिका विवाहित होने पर अपने देवर के लिए सुख समृद्धि लेकर आती है । वहीं बिशाखा के चतुर्थ चरण में जन्मी बालिका जो वृश्चिक राशि में पैदा हुई हो, बिच्छू की पुच्छ की तरह विषैली होने के कारण त्याज्य होती है, क्योंकि वह अपने देवर की मृत्यु एवं अन्य अमंगल लेकर ससुराल में प्रवेश करती है ।

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