कुण्डली में.एक से अधिक विवाह योग :
आपने देखा होगा कि कई लोगो के जीवन में प्रेम सम्बन्ध या विवाह का योग केवल एक ही नहीं होता बल्कि एक से अधिक होता है ! यही नहीं कई बार तो कुछ लोगों के अनेक सम्बंध होते हैं ! कई बार ऐसा भी होता है कि व्यक्ति एक सम्बन्ध टूटने या या एक जीवनसाथी की मृत्यु के बाद दुसरे सम्बन्ध में पड़ता है ! परन्तु कई बार तो ऐसी स्थिति भी देखी जाती है कि व्यक्ति एक साथ ही एक से अधिक रिश्ते बना लेता है ! ऐसी स्थितियां क्यों होती हैं ? आइए जानते हैं कि कौन से ग्रह या योग और उनकी स्थितियां इसके लिए जिम्मेदार हैं –
1. यदि सप्तमेश अपनी नीच राशी में स्थित हो तब जातक की दो पत्नियाँ या दो महिला से सम्बन्ध होते हैं !
2. यदि सप्तमेश, पाप ग्रह के साथ किसी पाप ग्रह की राशि में स्थित हो और जन्मांग या नवमांश का सप्तम भाव शनि या बुध की राशि में हो तब दो विवाह की सम्भावनाएं बनती हैं !
3. यदि मंगल और शुक्र सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव में शनि स्थित हो और लग्नेश अष्टम भाव में हो तब जातक के तीन विवाह या सम्बन्ध हो सकते हैं !
4. यदि सप्तमेश सबल हो, शुक्र द्विस्वभाव वाली राशि में स्थित हो जिसका अधिपति ग्रह उच्च का या स्वराशि का हो तो व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियां या बहुत से रिश्ते होंगे !
5. यदि सप्तमेश उच्च का हो या वक्री हो अथवा शुक्र लग्न भाव में सबल होकर स्थित हो तो जातक की कई पत्नियां/सम्बन्ध होते हैं !
6. यदि सप्तम भाव में पाप ग्रह हो, द्वितीयेश पाप ग्रह के साथ हो और लग्नेश अष्टम भाव में स्थित हो तब जातक के दो विवाह होते हैं !
7. यदि शुक्र जन्मांग या नवमांश कुण्डली में किसी पापी ग्रह की युति में अपनी नीच राशि में स्थित हो तब व्यक्ति का दो विवाह होना निश्चित है !
8. यदि सप्तम भाव और द्वितीय भाव में पापी ग्रह स्थित हों और इनके भावेश निर्बल हों तब जातक पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह करेगा !
9. यदि सप्तम भाव और अष्टम भाव में पापी ग्रह स्थित हों मंगल द्वादश भाव में हों और सप्तमेश की सप्तम भाव पर दृष्टि न हो तब जातक की पहली पत्नी की मृत्यु हो जाती है और वह दूसरा विवाह करता है !
10. यदि सप्तमेश और एकादशेश एक ही राशि में स्थित हों अथवा एक दुसरे पर परस्पर दृष्टि रखते हों या एक दूसरे से पंचम नवम स्थान में स्थित हों तब भी जातक के कई विवाह या प्रेम सम्बंध होते हैं !
11. यदि सप्तमेश चतुर्थ भाव में स्थित हों और नवमेश सप्तम भाव में हों, अथवा सप्तमेश और एकादशेश एक दूसरे से केंद्र में या युति में हों तब भी जातक के एक से अधिक विवाह होंते हैं !
12. यदि द्वितीय भाव और सप्तम भाव में पापी ग्रह स्थित हों तथा सप्तमेश के ऊपर पापी ग्रह की दृष्टि हो तब पति या पत्नी की मृत्यु के कारण जातक को तीन या उससे भी अधिक बार विवाह करना पड़ सकता है !
#शादी_तय_होकर_भी_क्यों_टूट_जाती_है :
1 - यदि कुण्डली में सातवें भाव का स्वामी सप्तमांश कुण्डली में किसी भी नीच ग्रह के साथ अशुभ भाव में बैठा हो तब विवाह तय नहीं हो पाता है !
2 - यदि दूसरे भाव का स्वामी अकेला सातवें भाव में स्थित हों तथा शनि पांचवें अथवा दशम भाव में वक्री अथवा नीच राशि का हो तब रिश्ता तय होकर भी टूट जाता है !
3 - यदि जन्म श्रवण नक्षत्र में हआ हो तथा कुण्डली में कही भी मंगल एवं शनि की युति हो तब रिश्ता तय होकर भी टूट जाता है !
4 - यदि जातक का जन्म मूल नक्षत्र में हो तथा गुरु सिंह राशि में स्थित हो तब भी विवाह का रिश्ता तय होकर भी टूट जाता है ! बशर्ते किसी भी दशा में गुरु वर्गोत्तम नहीं हों !
5 - यदि जन्म नक्षत्र से सातवें, बारहवें, सत्रहवें, बाइसवें या सत्ताइसवें नक्षत्र में सूर्य स्थित हों तब भी विवाह तय होकर टूट जाता है !
#तलाक_होने_के_लिए_जिम्मेदार_योग :
1 - यदि कुण्डली मांगलिक हो तब विवाह होकर भी तलाक हो जाता है ! किन्तु ध्यान रहे किसी भी हालत में सप्तमेश वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए !
2 - यदि दूसरे भाव का स्वामी नीचस्थ लग्नेश के साथ स्थित होकर मंगल अथवा शनि की दृष्टि में हो, तब तलाक हो जाता है ! किन्तु मंगल अथवा शनि को लग्नेश या द्वितीयेश नहीं होना चाहिए !
3 - यदि जन्म कुण्डली का सप्तमेश सप्तमांश कुण्डली का अष्टमेश हो अथवा जन्म कुण्डली का अष्टमेश सप्तमांश कुण्डली का लग्नेश हो एवं दोनों कुण्डली में लग्नेश एवं सप्तमेश अपने से आठवें भाव के स्वामी की दृष्टि में हो तब तलाक निश्चित हो जायगा !
4 - यदि पत्नी का जन्म नक्षत्र ध्रुव संज्ञक हो एवं पति का चर संज्ञक तब तलाक हो जाता है ! किन्तु किसी का भी मृदु संज्ञक नक्षत्र नहीं होना चाहिए !
5 - यदि अकेला राहू सातवें भाव में तथा अकेला शनि पांचवें भाव में स्थित हो तब तलाक हो जाता है ! किन्तु ऐसी अवस्था में शनि को लग्नेश नहीं होना चाहिए ! या लग्न में उच्च का गुरु नहीं होना चाहिए !
#पति_पत्नी_के_चरित्र_भी_ग्रहों_पर_निर्भर :
1 - यदि कुण्डली के बारहवें भाव में शुक्र तथा तीसरे भाव में उच्च का चन्द्रमा स्थित हो तो जातक चरित्र भ्रष्ट होता है !
2 - यदि सातवें भाव में मंगल तथा शुक्र एवं पांचवें भाव में शनि स्थित हों तब जातक में चारित्रिक दोष होता है !
3 - यदि नवमेश नीच तथा लग्नेश छठे भाव में राहू से युक्त हों तब निश्चित ही चारित्रिक दोष होता है !
4 - यदि आर्द्रा, विशाखा, शतभिषा अथवा भरणी नक्षत्र में जातक का जन्म हो तथा मंगल एवं शुक्र दोनों ही कन्या राशि में स्थित हों तब जातक अवश्य ही पतित चरित्र वाला होता है !
5 - कन्या लग्न में लग्नेश बुध यदि लग्न में ही स्थित हो तब यद्यपि कि पंच महापुरुष योग बनता है, किन्तु यदि बुध के साथ शुक्र एवं शनि भी स्थित हों तब जातक में नपुंसकत्व आ जाता है !
6 - यदि सातवें भाव में राहू स्थित हो तथा कर्क अथवा कुम्भ राशि का मंगल लग्न में स्थित हों या लग्न में शनि-मंगल एवं सातवें भाव में नीच का कोई भी ग्रह स्थित हो तब पति एवं पत्नी दोनों ही एक दूसरे के साथ बेवफाई करने वाले होते है !
#इन_ग्रह_स्थितियों_में_विवाह_होगा_ही_नहीं :
यदि सप्तमेश शुभ स्थान पर नहीं हों !
यदि सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर स्थित है !
यदि सप्तमेश नीच राशि में है !
यदि सप्तमेश बारहवें भाव में स्थित हो,और लगनेश या राशिपति सप्तम में स्थित है !
जब चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों !
जब शुक्र और मंगल दोनों सप्तम भाव में हों !
जब शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में स्थित हों !
जब शुक्र किसी पापी ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में स्थित हों !
जब कभी शुक्र, बुध, शनि यह तीनो ग्रह नीच के हों !
जब पंचम में चन्द्र हो, सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापीग्रह हों !
जब सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर अंश का हो !
#शुभ_ग्रह_हमेशा_शुभ_फल_ही_नहीं_देते_हैं :
(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण) -
ज्योतिषीय नियम है कि कुण्डली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है !
जैसे — मानसागरी में वर्णन किया गया है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है !
( किं करोति सर्वे ग्रहःकेन्द्रे यदि बृहस्पतिः )
1 . किन्तु, विडम्बना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक भी है, वैवाहिक सुख के लिए विच्छेदक सिद्ध हुआ हैं !
यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, फिर भी कुण्डली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता होता है ! सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से सम्बन्धित सुखों की हानि करता है ! प्राय: शनि को विलम्बकारी माना जाता है, पर स्त्रियों की कुण्डली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलम्ब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की सम्भावना ही न्यून हो जाती है !
यदि विवाह हो भी जाय तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल ला देता हैं !
"वैद्यनाथ" ने 'जातक पारिजात', अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है —
‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ !
अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है ! कर्क लग्न की कुण्डलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है ! व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुण्डली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं !
. "एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है ! सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है ! यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं ! चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं ! दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला !"
पुरुषों की कुण्डली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है ! यदि इसके साथ शनि और केतु की युति हो तब तो नपुंसकता का परिमाण और भी बढ़ जाता है ! ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है ! सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है !
‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तब जातक की पत्नी, पति और कुल की नाशक होती है !’’ सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान है ! चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक हैं ! चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है !
दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है ! अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन सम्बन्धों का कारक बनता है ! यदि शुक्र मिथुन या कन्या राशि में स्थित हो या इसके साथ कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध या राहु स्थित हो, तब शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन सम्बन्धों का सृजन करती है !
ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ हो ही नहीं सकते, बल्कि वह चंचल स्वभाव, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल परन्तु शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाला होता है ! क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है ? कदापि नहीं ! इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुण्डली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं !
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