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Showing posts from June, 2022

विवाह में बाधक कुछ योग और स्थितियाँ

विवाह में बाधक कुछ योग व स्थितियाँ : 1 - जन्म कुण्डली में 6, 8, 12वें भावों को अशुभ माना जाता है ! मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य  क्रूर ग्रह माने गये है ! इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आना निश्चित है । 2 - यदि सप्तमेश द्वादश भाव में स्थित हों और राहू लग्न में बैठा हो, तब वैवाहिक सुख में समस्या होना निश्चित है । 3 - यदि सप्तम भाव में स्थित राहु के साथ व्ययेश भी युति कर रहे हों तब वैवाहिक सुख में कमी होना निश्चित है । 4 - यदि द्वादश भाव में स्थित सप्तमेश अथवा सप्तम भाव में स्थित द्वादशेश से राहू की युति या दृष्टि सम्बन्ध बन रहा हो, तब दांपत्य सुख में कमी के साथ ही विवाह विच्छेद की प्रबल सम्भावना बन जाती है ।  5 - यदि लग्न में शनि-राहू स्थित हो जाँय तब भी दांपत्य सुख प्रभावित होता है । 6 - यदि सप्तमेश छठवे, अाठवें या द्वादश भाव में स्थित हो गये हों, तब भी वैवाहिक सुख  प्रभावित होता है । 7 - यदि षष्ठेश का सम्बन्ध द्वितीय, सप्तम भाव अथवा द्वितीयेश, सप्तमेश अथवा शुक्र से हो जाय, तब भी वैवाहिक सुख व पति पत्नी का आपसी प्रेम बाधित होता है । 8 -  षष्टम भाव न...

कुंडली मे बनने वाले जेल योग

कुंडली में कब बनते हैं जेल योग ? **  कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह है। अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड़ जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड़ जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन...

अकाल मृत्यु सबन्धित कुछ योग

अकाल मृत्यु सम्बंधित कुछ योग : मृत्यु एक अटल सत्य है ! कोई इस संयोंग को बदल नहीं सकता ! कब, किस कारण, किसकी कहाँ पर मौत होगी, यह कोई भी नहीं बता सकता है ! कुछ लोगों की मृत्यु कम उम्र में ही हो जाती है, ऐसी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहते हैं ! उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रफुल्ल भट्‌ट के अनुसार, जन्म कुण्डली में जब कुछ खाश अशुभ योग बनते हैं तब व्यक्ति की अकाल मृत्यु होने के कारण बनते हैं ! यह अशुभ योग किन ग्रहों के कारण बनते हैं, इसकी जानकारी आगे दी जा रही है — 1. जिसकी कुण्डली के लग्न भाव में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना में मृत्यु होने की पूर्ण सम्भावना रहती है । 2. यदि कुण्डली में राहु-मंगल की युति हो अथवा दोनों समसप्तक होकर एक-दूसरे को देख रहे हों तब भी दुर्घटना में मृत्यु होने का कारण हो सकता है । 3. यदि छठवे भाव का स्वामी पापी ग्रह से युक्त होकर छठवे या आठवे भाव में स्थित हो तब उसकी दुर्घटना में मृत्यु होने का भय रहता है । 4. ज्योतिष शास्त्र के अऩुसार, यदि लग्न भाव, द्वितीय भाव व बारहवें भाव में अशुभ ग्रह स्थिति हों तब उस व्यक्ति क...

राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं

राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं… 1)  जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए बनती है. राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने का सोचता है. राहु को स्वभाव व संस्कृ्ति से अलग हटकर कार्य करने की प्रवृ्ति  का माना जाता है. 2.) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है. कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व पापी ग्रह माना गया है. इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं बनती है.    3.) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है.  4)  जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है.

अकाल मृत्यु सबन्धित कुछ योग

अकाल मृत्यु सम्बंधित कुछ योग : मृत्यु एक अटल सत्य है ! कोई इस संयोंग को बदल नहीं सकता ! कब, किस कारण, किसकी कहाँ पर मौत होगी, यह कोई भी नहीं बता सकता है ! कुछ लोगों की मृत्यु कम उम्र में ही हो जाती है, ऐसी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहते हैं ! उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. प्रफुल्ल भट्‌ट के अनुसार, जन्म कुण्डली में जब कुछ खाश अशुभ योग बनते हैं तब व्यक्ति की अकाल मृत्यु होने के कारण बनते हैं ! यह अशुभ योग किन ग्रहों के कारण बनते हैं, इसकी जानकारी आगे दी जा रही है — 1. जिसकी कुण्डली के लग्न भाव में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना में मृत्यु होने की पूर्ण सम्भावना रहती है । 2. यदि कुण्डली में राहु-मंगल की युति हो अथवा दोनों समसप्तक होकर एक-दूसरे को देख रहे हों तब भी दुर्घटना में मृत्यु होने का कारण हो सकता है । 3. यदि छठवे भाव का स्वामी पापी ग्रह से युक्त होकर छठवे या आठवे भाव में स्थित हो तब उसकी दुर्घटना में मृत्यु होने का भय रहता है । 4. ज्योतिष शास्त्र के अऩुसार, यदि लग्न भाव, द्वितीय भाव व बारहवें भाव में अशुभ ग्रह स्थिति हों तब उस व्यक्ति क...

निःसंतान योग और उसका निवारण

निःसंतान योग और उसका निवारण : ज्योतिषीय गणनाओं एवं विभिन्न जातको की जन्म कुण्डली का विश्लेषण करने पर पाया गया है कि अधिकांशतः संतान हीनता निम्न संयोगों के कारण होती है  ▪1 - यदि कुण्डली के पञ्चम् भाव का स्वामी 6, 8, या 12वें भाव में स्थित हो गया हो । ▪2 - यदि कुण्डली के पञ्चम् भाव का स्वामी किसी भी भाव में अस्त हो गया हो अर्थात सूर्य के साथ बैठा हो । ▪3 - यदि कुण्डली के पञ्चम् भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, राहु, शनि, इनमें से एक, दो, तीन अथवा चारों एक साथ स्थित हो जाँय । ▪4 - यदि कुण्डली के पांचवें,दसवें या दूसरे भाव में मंगल की मौजूदगी हो । ▪5 - यदि कुण्डली के आठवें अथवा तीसरे भाव में शनि स्थित हों । ▪6 - यदि तीसरे भाव का स्वामी लग्न, धन, पञ्चम् इन भावो में उपस्थित हों । ▪7 - यदि पञ्चम् भाव में चन्द्रमा, बुध के साथ मौजूद हों, तब भी संतानहीनता हो सकती है ! इसका कारण यह है कि मनुष्य पूर्व जन्म में ब्राह्मण से द्रोह किया था । ▪8 - यदि पञ्चम् भाव का स्वामी स्त्री ग्रह हो, केंद्र में (1,4,7,10) इन भावो में चन्द्र, बुध, शुक्र, राहु की उपस्थिति हो तब संतानहीनता होती है, एेसा समझना चाहिए...

राहु का भावानुसार फल

राहु का विभिन्न भावानुसार फल :----- लग्न --- सनक, नकारात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव, किसी चीज़ का लत या व्यसन। द्वितीय --- कुटुंब परिवार अथवा पैतृक संपत्ति को लेकर विवाद, कुटुंब के द्वारा धोखा अथवा आर्थिक नुकसान, गर्दन में कोई तकलीफ़, स्थायी संपत्ति बनाने में अड़चन। तृतीय --- भाई बहनों से विवाद या फिर उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी, खेलकूद पराक्रम में वृद्धि, आयात निर्यात के काम में सफलता, कंधे या फिर हाथों में कोई तकलीफ़। चतुर्थ --- पारिवारिक वातावरण कलहपुर्ण, माता से संबंधित कोई चिंता या तकलीफ़, मकान की चिंता , हार्ट संबंधी तकलीफ़। पंचम --- प्रेमी/प्रेमिका अथवा संतान से धोखा अथवा परेशानी, संतान प्राप्ति अथवा शिक्षा प्राप्ति में बाधा, अपयश। षष्ठम --- रोग ऋण और शत्रुओं पर विजय, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता, पेट में कोई तकलीफ़, ननिहाल पक्ष से निराशा या विवाद। सप्तम --- वैवाहिक जीवन में विवाद, साझेदारी के काम में धोखाधड़ी, गुप्त रोग। अष्टम --- जीवन में शुभ और अशुभ अकस्मात घटनाएं, मुत्र संबंधित कोई रोग, अकस्मात धन लाभ, ससुराल पक्ष से निराशा या विवाद। नवम --- विदेश से लाभ, विदेशी व्यापार अथवा औनला...

मुझे मालुम है.....

मुझे मालुम है मैं अब किसी का हो नही सकता तुम्हारा साथ गर मांगू तो तुम मंजुर मत करना  यहाँ का हूं वहाँ का हूं खुदा जाने कहां का हूं मुझे दुरी से क़ुरबत है ये दुरी दुर मत करना न घर अपना न दर अपना जो कमियां है वो कमियां है अधुरेपन का आदी हूँ मुझे भरपूर मत करना जो शोहरत के लिए गिरना पड़ें खुद अपनी नजरो से तो फिर खुदा हरगिज मुझे मशहूर मत करना ।