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Showing posts from January, 2022

षोडष वर्ग कुण्डली एवम उसका फलित

षोडष वर्ग कुण्डली तथा उसका फलित : .      षोडश वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है ! जन्मपत्री का सूक्ष्म अध्ययन करने में यह विशेष बहुत सहायक होते हैं ! इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुण्डली का विश्लेषण अधूरा होता है ! क्योंकि जन्म कुण्डली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में ही विस्तृत जानकारी मिलती है, परन्तु षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है ! #षोडशवर्ग_किसे_कहते_है : .     हम जानते हैं कि अगर राशिचक्र को बराबर 12 भागों में बांटा जाय तब हर एक हिस्‍सा राशि कहलाता है ! सूक्ष्‍म फलकथन के लिए राशि के भी विभाग किए जाते हैं और उन्‍हें वर्ग कहते हैं ! वर्गों को अंग्रेजी में डिवीजन (division) और वर्गों पर आधारित कुण्‍डली (वर्ग चर्क्र) को डिवीजनल चार्ट (divisional chart) कह दिया जाता है ! वर्गों को ज्‍योतिष में नाम दिए गए हैं ! जैसे — .     यदि राशि को दो हिस्‍सों में बांटा जाय तब ऐसे विभाग को होरा कहते हैं ! इसी तरह यदि राशि के तीन हिस्‍से किये जायें तब उस...

नवमांश कुण्डली

नवमांश कुंडली के द्वारा जातक के जीवन साथी पर विचार करते है !   🔸नवमांश कुंडली का लग्नेश यदि मंगल हो तो जातक की स्त्री क्रूर तथा लड़ाकू होती है परन्तु यदि मंगल के साथ शुक्र भी हो तो जातक की स्त्री सुंदर होने के साथ साथ कुलता होती है !   🔸यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश सूर्य हो तो जातक की स्त्री पतिव्रता होने के साथ साथ उग्र स्वाभाव की होती है !   🔸यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश चन्द्रमा हो तो शीतल स्वाभाव की गौरवर्ण की व मिलन सर होती है !   🔸यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश बुध हो तो कला में प्रवीण चतुर व ज्ञानवान होती है!   🔸यदि नवमांश कुंडली का लग्नेश गुरु हो तो जातक की स्त्री धार्मिक कार्यो में लगी रहने वाली बहूत अधिक पूजा पाठ करने वाली और अंत समय में गृहस्थ जीवन से विरक्त होने वाली होती है !   🔸यदि लग्नेश शुक्र हो तो जातक की स्त्री सुंदर होने के साथ साथ श्रंगार प्रिय विलासी और प्रत्येक कार्य को निपुणता से करने वाली होती है !   🔸यदि नवमांश के लग्नेश शनि हो तो जातक की स्त्री अध्यात्मिक होने के साथ साथ न्याय प्रिय आचरण प्रिय तथा मेहनती होती है !  ·...

विभिन्न भाव के कारक ग्रह

विभिन्न भाव के कारक ग्रह :-- किसी भी भाव के शुभाशुभ फल जानने के लिए यह आवश्यक होता है कि हम उस भाव के कारक ग्रह को एवं कुण्डली में उस ग्रह की वर्तमान स्थिति को देखकर ही विश्लेषण करें, तभी यथेष्ठ परिणाम सामने आ सकता है ! नीचे सभी भाव व उनके कारक ग्रह दिए जा रहे हैं :- 1  -   प्रथम भाव   -- सूर्य, 2  -   दूसरा भाव   -- गुरू, 3  -  तृतीय भाव   – मंगल, 4 -   चतुर्थ भाव    – चंद्र, 5 -   पंचम भाव    – गुरु, 6 -     षष्ठ भाव     – मंगल, 7 - सप्तम भाव     – शुक्र, 8  - अष्टम भाव     – शनि, 9  -  नवम भाव     – गुरु, 10- दशम भाव     – गुरु, सूर्य, बुध और शनि, 11-एकादश भाव  – गुरु, 12-द्वादश भाव    – शनि !  *           सभी भाव को कोई न कोई विचारणीय विषय प्रदान किया गया है जैसे प्रथम भाव को व्यक्ति का रंग रूप व्यक्तित्व, तो दुसरा भाव धन,...

आठ मुखी रूद्राक्ष

शिवपुराण के अनुसार अष्टमुखी रुद्राक्ष भैरव महाराज का रूप माना जाता है ! जो लोग इस रुद्राक्ष को धारण करते हैं, वे अकाल मृत्यु से शरीर का त्याग नहीं करते हैं ! ऐसे लोग पूर्ण आयु जीते हैं ! वे लोग जो रोग मुक्त जीवन जीना चाहते हैं उनके लिए आठ मुखी रुद्राक्ष एकदम उपयुक्त है ! इस रुद्राक्ष के लिए मंत्र है— "ॐ हुम नम: !" आठ मुखी रुद्राक्ष में कार्तिकेय, गणेश और गंगा का अधिवास माना जाता है ! राहु ग्रह की प्रतिकूलता होने पर भी इसे धारण करना चाहिए ! मोतियाविंद, फेफड़े के रोग, पैरों में कष्ट, चर्म रोग आदि रोगों तथा राहु की पीड़ा से यह छुटकारा दिलाने में सहायक है ! इसकी तुलना गोमेद से की जाती है ! आठ मुखी रुद्राक्ष अष्ट भुजा देवी का स्वरूप है ! यह हर प्रकार के विघ्नों को दूर करता है ! इसे धारण करने वाले को अरिष्ट से मुक्ति मिलती है। इसे सिद्ध कर धारण करने से पितृदोष दूर होता है। मकर और कुंभ राशि वालों के लिए यह अनुकूल है ! मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ व मीन लग्न वाले इससे जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं ! #आठमुखी_रुद्राक्ष_के_लाभ_अभिमंत्रित_व_धारण_करने_की_विधि ...

छः मुखी रूद्राक्ष

रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के रूद्र से हुई है इसलिए इसका नाम रुद्राक्ष पड़ा ! रुद्राक्ष को पूर्ण विधिवत व श्रद्धा अनुसार धारण करने से भगवान शिव की तो विशेष कृपा प्राप्त होती ही है साथ में रुद्राक्ष को उनके मुख के अनुसार धारण करने से अलग-अलग देवों द्वारा भी आशीर्वाद प्राप्त होता है ! एक से लेकर 14 मुखी तक के सभी रुद्राक्षों में अलग-अलग देवों का आशीर्वाद निहित होता है ! आज हम आपको 6 मुखी रुद्राक्ष के महत्व और इसे सिद्ध करने के उपरान्त धारण करने की विधि के विषय में जानकारी देंगे ! #6_मुखी_रुद्राक्ष_के_अधिदेव:  6 मुखी रुद्राक्ष को भगवान शिव के पुत्र भगवान कार्तिकेय का स्वरुप माना गया है ! ज्योतिष के प्रभाव अनुसार इस रुद्राक्ष को धारण करने से शुक्र मजबूत बनता है ! शुक्र जनित दोषों को दूर करने में यह रुद्राक्ष बहुत प्रभावी सिद्ध होता है ! पुराणों के अनुसार 6 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से ब्रह्म हत्या जैसे भयंकर पाप से भी मुक्ति मिल जाती है ! #6_मुखी_रुद्राक्ष_के_लाभ :  1-  6 मुखी रुद्राक्ष को विधिवत धारण करने से भगवान शिव , भगवान कार्तिकेय और शुक्र गुरु से आशीर्वाद प्राप्त...

कण्टक शनि दोष

शनि द्वारा विभिन्न राशियों पर साढ़ेसाती, ढैय्या, विष दोष की तरह ही कण्टक-शनि दोष भी कुछ विशेष स्थितियों में प्रभावी होता है, जो अपनी स्थिति के अनुसार जातक को अशुभ फल ही देता है ! वैसे भी कण्टक का शाब्दिक अर्थ काँटा होता है, मतलब इस स्थिति के उत्पन्न होने पर काँटा के समान कुछ चुभने वाली स्थितियाँ बन सकती हैं ! परन्तु चन्द्रमा की डिग्री व नक्षत्र, चरण बदलने पर भी इसका असर अलग हो जाता है, यदि उन स्थितियों में चन्द्रमा अच्छी व मजबूत स्थिति में होगा तब इस दोष का प्रभाव नगण्य होगा । आज हम इसी कण्टक शनि दोष के बारे में जानकारी देना चाहेंगे । कण्टक शनि दोष का मतलब है, शनि गोचर में किस स्थिति में होने पर साढ़ेसाती, ढैय्या व विष दोष के अतिरिक्त भी कष्टकारक हो जाता है, जिसे दक्षिण भारत में कण्टक शनि (काँटे के समान कष्टकारक पीड़ा देने वाला) दोष के नाम से जाना जाता है ! .     यहाँ हम बताना चाहेंगे कि कुण्डली में शनि के दो स्थितियों में विराजमान होने पर कंटक शनि दोष उत्पन्न होता है और जातक को कष्टकारक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर आर्थिक तंगी व शारीरिक समस्या से कष्ट होना ! वह ...

नशा के कारक एवम उपचार

▶️किसी की जन्मकुंडली से केसे जाने की वह नशा करता हें या नहीं यदि — 🔸लग्न में पाप ग्रह हो तो व्यक्ति की रुचि नशे में रहेगी। 🔸लग्नेश अर्थात मुख्‍य ग्रह निर्बल हो, पाप प्रभाव में हो, तो नशे में रुचि रहेगी। 🔸यदि लग्नेश नीच का हो, शत्रु क्षेत्री हो, चंद्रमा भी वीक हो तो नशे में रुचि रहेगी। 🔸लग्नेश का मंगल देखें तो व्यसन में रुचि होती है। 🔸व्यय स्थान का पापी ग्रह अध्ययन में धन व्यय कराता है। 🔸बृहस्पति नीच का हो तो व्यसन में रुचि रहती है। 🔸शुक्र-राहु या केतु के साथ हो, मुख्‍य ग्रह व चंद्रमा कमजोर हो तो व्यसन में रुचि होती है। 🔸शनि का लग्न हो, शुक्र अष्टस्थ हो और शनि से दृष्ट हो तो भयंकर व्यसन होता है। लग्न पर सूर्य की दृष्टि माँस-मदिरा में, शनि की दृष्टि सिगरेट-गांजा आदि, मंगल की दृष्टि मदिरापान में रुचि जगाती है। 🔸यदि हॉरोस्कोप पितृ दोष से प्रभावित हो तो भी परिवार में नशे का दानव घर जमाता है। 🔸अपनी नीच राशी वृश्चिक में चन्द्रमा अक्सर जातक को मादक पदार्थो का सेवन कराता है | 🔸क्रूर गृह शनि , राहू पीड़ित बुध और क्षीण चन्द्रमा इसमें इजाफा करते है | 🔸हालाँकि वृश्चिक पर वृहस्पति की द्र...

पांच मुखी रूद्राक्ष

 मुखी रुद्राक्ष साक्षात् रूद्र अवतार है ! इसके अधिपति गृह ब्रहस्पति देव है ! इसलिए ज्योतिष के अनुसार ब्रहस्पति कमजोर होने पर पांच मुखी रुद्राक्ष को धारण किया जाना चाहिए ! जो सच्चे शिवभक्त होते है उन्हें पांच मुखी रुद्राक्ष की माला अवश्य धारण करनी चाहिए ! पांच मुखी रुद्राक्ष के प्रति भगवान शिव का विशेष लगाव है इसके साथ ही पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करने से भगवान श्री विष्णु , भगवान गणेश, सूर्य देव और माँ भगवती की विशेष कृपा प्राप्त होती है ! पांच मुखी रुद्राक्ष पूरी दुनिया में सबसे अधिक पैदा होते है ! इसलिए यह बहुत ही सामान्य रूप से प्राप्त हो जाते है ! अन्य रुद्राक्षों की अपेक्षा ये नकली या बनावटी  बहुत ही कम मिलते है ! असली रुद्राक्ष सदैव प्रभावी होते हैं, चाहे वह कितने भी मुख के क्यों न हो !   #पाँचमुखी_रुद्राक्ष_के_लाभ : – पांच मुखी रुद्राक्ष में पंचदेवों की कृपा का वास है इसलिए पंच तत्व जनित दोषों को दूर करने में पांच मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व है ! मेष , धनु, और मीन राशि के जातकों को पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करने पर विशेष लाभ प्राप्त होता है ! नकारात्मक उर्जा व मन म...

चार मुखी रुद्राक्ष

चार मुखी रुद्राक्ष ब्रम्हा के चारो मुख का स्वरूप है ! यह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को प्रदान कराने वाला एकमात्र साधन है ! चारमुखी रुद्राक्ष धारण करने पर चारो वेदों के पाठ के समान पुण्य लाभ होता है ! यह दुर्लभ और अनुपम मनका है ! इसे अकेले धारण करने पर भी सब प्रकार की बाधाओं से निजात प्राप्त होता है ! चार मुखी रूद्राक्ष को ब्रह्मा तथा देवी सरस्वती का प्रतिनिधि भी माना जाता है ! बुद्ध इनके संचालक है इस कारण यह चार मुखी रूदाक्ष शिक्षा के क्षेत्र में खूब सफलता प्रदान करता है ! चार मुखी रुद्राक्ष बुद्ध के हानिकारक प्रभाव को समाप्त करने और देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उत्तम है ! यह तार्किक और संरचनात्मक सोच को नियंत्रित करता है ! एवं मन को भटकने से रोकने व एकाग्रचित्त रखने और शरीरिक स्वास्थ्य को बनाये रखने में मदद करता है ! यह मानसिक शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, एकाग्रता और ज्ञान को बढ़ाने में मदद करता हैं ! चार मुखी रुद्राक्ष का उपयोग करने से दिमागी कमज़ोरी दूर होती है ! सात्विक विचारों तथा धर्म के प्रति आस्था को बढ़ाता है ! स्नायु तथा मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाता है ! चार मुखी रुद्राक्ष बच्चो...

कैसा होगा आपका जीवनसाथी

विवाह से पूर्व कुण्डली मिलान करते समय जीवन साथी की कुण्डली के सप्तम भाव एवं सप्तमेश की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए, इसी से ज्ञात होता है कि पत्नी या पति कैसा होगा : #कैसे_मिले_रूपवती_पत्नी_और_धनवान_पति :          विवाह के संदर्भ में कन्या की आकांक्षा धनवान पति और वर की कामना सुंदर पत्नी की होती है ! दोनों के माता-पिता भी कुण्डलियों के मिलान के साथ बहू या  दामाद के बारे में सौंदर्य और धन को प्राय: केंद्र में रखते हैं ! आइए जानें कि किन योगों में सुंदर पत्नी और धनवान पति प्राप्त होता है — .       यदि वर की कुण्डली के सप्तम भाव में  वृषभ या तुला राशि होती है तब उसे सुंदर पत्नी मिलती है ! यदि कन्या की कुण्डली में  चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई भी स्थित हों तब उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा धनवान होता है ! #वर_की_कुण्डली_में_सुंदर_पत्नी_के_योग :  1.        जब सप्तमेश सौम्य ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, सोम) होता है तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही स्थित होता है त...

वैवाहिक संबंधो पर ग्रहों का प्रभाव

ज्योतिष एक अथाह सागर है जो जीवन के हर पहलू पर रोशनी डालता है !  एक अच्छे ज्योतिषी को ज्योंतिष की सभी शाखाओं का अध्ययन करना चाहिए और अपने अनुभव से उनका प्रयोग कुण्डली पर करना चाहिए !  पाराशर ज्योतिष के अनुसार कुण्डली देखते  समय जन्म कुण्डली,वर्ग कुण्डली, दशा,  नक्षत्र और गोचर का भी विश्लेषण आवश्यक होता है ! सभी वर्गों में नवांश को अत्यधिक महत्व दिया गया है, इसी वजह से आज का यह लेख नवांश पर आधारित है ! किस प्रकार नवांश कुंडली से आप अपने और अपने जीवनसाथी के बीच अंतरंग सम्बंधों की  ज्योंतिषीय परिणाम देख सकते हैं ! जैसा की ज्योतिष के सभी जानकारों को ज्ञात है कि सप्तम भाव, सप्तम भाव का स्वामी और शुक्र से वैवाहिक जीवन का विचार किया जाता है ! इन भावों के अलावा द्वादश भाव पति पत्नी के अंतरंग सम्बंधों के  लिए, दूसरा भाव कुटुम्ब के लिए, चौथा भाव परिवार के लिए भी देखे जाते हैं ! यदि इन  भावों का सम्बंध या इनके स्वामियों का सम्बंध मंगल, शनि, राहु एवं केतु से हो तब वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं होता है ! यदि शुक्र, मेष,सिंह, धनु, वृश्चिक राशि में स्थित हों या नीच का हो और...

लग्न के अनुसार रत्न औऱ रुद्राक्ष

प्रत्येक लग्न के लिए एक ग्रह ऐसा होता है जो योगकारक होने के कारण शुभ फलदायी होता है ! यदि ऐसा ग्रह कुण्डली में बलवान अर्थात् उच्चराशिस्थ, स्वराशिस्थ् या वर्गोत्तमी होकर केन्द्र या त्रिकोण भाव में शुभ ग्रह के प्रभाव में स्थित हो व इस पर किसी भी पाप ग्रह का प्रभाव न हो तब यह अकेला ही जातक को उन्नति देने में सक्षम होता है ! अतः इसका रत्न धारण करना विशेष शुभ फलदायी तथा चमत्कारी प्रभाव देने वाला होगा, परन्तु यदि यह अशुभ भाव में अशुभ ग्रहों के प्रभाव से ग्रस्त हो तब जातक इस योगकारक ग्रह के चमत्कारी प्रभाव से वंचित रह जाता है ! ऐसी स्थिति में इसकी अशुभ भाव जनित अशुभता को नष्ट करने हेतु इसके लिये रुद्राक्ष धारण किया जाना चाहिए !          आज कल की भाग दौड़ व अतिव्यस्तता भरी जीवन-शैली में कई बार पूजा पाठ आदि के लिए समय दे पाना सम्भव नहीं हो पाता ! ऐसी स्थिति में रत्न धारक को सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए, क्योंकि रत्न सकारात्मक ऊर्जा वाले व्यक्ति के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध होते हैं ! जहां शुभ, योगकारक व बली ग्रहों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए रत...

प्रेम विवाह के ज्योतिषीय योग

1. जन्म पत्रिका में मंगल यदि राहू या शनि से युति बना रहा हो तो प्रेम-विवाह की संभावना होती है। 2. जब राहू प्रथम भाव यानी लग्न में हो परंतु सातवें भाव पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो व्यक्ति परिवार के विरुद्ध जाकर प्रेम-विवाह की तरफ आकर्षित होता है। 3. जब पंचम भाव में राहू या केतु विराजमान हो तो व्यक्ति प्रेम-प्रसंग को विवाह के स्तर पर ले जाता है। 4. जब राहू या केतु की दृष्टि शुक्र या सप्तमेश पर पड़ रही हो तो प्रेम-विवाह की संभावना प्रबल होती है। 5. पंचम भाव के मालिक के साथ उसी भाव में चंद्रमा या मंगल बैठे हों तो प्रेम-विवाह हो सकता है। 6. सप्तम भाव के स्वामी के साथ मंगल या चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तो भी प्रेम-विवाह का योग बनता है। 7. पंचम व सप्तम भाव के मालिक या सप्तम या नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ विराजमान हों तो प्रेम-विवाह का योग बनता है। 8. जब सातवें भाव का स्वामी सातवें में हो तब भी प्रेम-विवाह हो सकता है। 9. शुक्र या चन्द्रमा लग्न से पंचम या नवम हों तो प्रेम विवाह कराते हैं। 10. लग्न व पंचम के स्वामी या लग्न व नवम के स्वामी या तो एकसाथ बैठे हों या एक-दूसरे को देख रहे ह...

भवन निर्माण हेतु वास्तु के अत्यावश्यक सूत्र

.        सब की यह चाहत होती है कि रहने के लिएअपना निजी घर हो, जिसमें वह सुकून के दो पल व्यतीत कर सकें ! परन्तु इस मंहगाई के समय में अच्छा भवन बनाना वाकई बहुत मुश्किल कार्य है ! .        #भवन_निर्माण_के_वास्तु_टिप्स :  .     यदि आप-अपना आशियाना बनवाने जा रहे है तब हम आपको कुछ ऐसे वास्तु टिप्स बताने जा रहे है, जिन्हें अपनाकर आप-अपने भवन में खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकते हैं ! 1.  प्राथमिक रूप से भवन निर्माण के लिए वर्गाकार या आयताकार भूखण्ड का चयन करना चाहिए ! विकृत भूमि का चयन कदापि नहीं करना चाहिएं क्योंकि उसमें नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है ! अतः भूखण्ड ऐसा होना चाहिए, जिससे भवन में हमेशा सकारात्मक उर्जा का प्रवाह  होता रहे ! 2.  दो विशाल भवनो या भूखण्डो के मध्य छोटा संकरा  भूखंड कभी उत्तम नहीं माना जा सकता है ! 3.  भवन निर्माण करते समय यह ध्यान रखें कि भूमि सूर्यवेधी या चन्द्र वेधी न हो, इसका विचार किसी वास्तु मर्मज्ञ से करा लेना चाहिए ! 4.  रहने योग्य भूखण्ड में सभी दिशाओं का  तालमेल इस प्रक...

सीमान्त होने का दंश

 सीमांत होने पर इसका दंश उस क्षेत्र को झेलना ही पड़ता है । अब सीमांत चाहे खेत का हो, गाँव का हो, तहसील का हो, जिला का हो, प्रदेश का हो या देश का अथवा किसी नक्षत्र व राशि के बीच फँसे चरण का सीमांत क्षेत्र हो वहाँ तक विकास की धारा और प्रकाश पहुँचते पहुँचते ही पहुँचती है और यदि पहुँची भी तो अपर्याप्त रूप से पहुँचती है । हम सबने इस बात का पूर्ण अनुभव करते रहते हैं । खेत के आखिरी छोर की सिंचाई, देखभाल उतनी अच्छी नहीं हो पाती जितनी मध्य भाग की, परिणाम स्वरूप वहाँ की उपज भी प्रभावित होती है । .     ठीक इसी तरह गण्डमूल नक्षत्र तो कहने के लिए बदनाम हैं, कुछ ऐसे भी नक्षत्र व चरण हैं जो न इधर के हैं और न उधर के अपने मूल स्वभाव के विपरीत अलग जगह फँस गये होते हैं, फलस्वरूप उस नक्षत्र के उस चरण को भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है और उपेक्षा का शिकार बन कर अविकसित रह जाते हैं, जिससे उनमें कुछ विकार आना स्वाभाविक हो जाता है । .     हम यहाँ बात कर रहे हैं कुछ नक्षत्रों के प्रथम चरण की वहीं कुछ नक्षत्रों के अंतिम चरण की जो अपने नक्षत्र के मूल राशि में न रहकर दूसरी राशि क...

परिवार के कुल देवता एवम कुण्डली के इष्ट देव

बहुत लोग इस भ्रम में रहते हैं कि उनकी जन्म कुण्डली के अनुसार उनका इष्टदेव कौन हैं ? इस विषय में मैं जानकारी देना चाहता हूँ कि आप यह कैसे जाने ?  .        वास्तव में आपके खानदान के कुल देवता या इष्टदेव आपके कुल देवता ही हैं ! अब आप कहेंगे कि हमें तो अपने कुल देवता के बारे में भी ठीक-ठीक जानकारी नहीं है .....! .       तब मैं बताना चाहूँगा  कि आपको अपने कुल देवता की जानकारी है, पर आप उस जानकारी को हल्के में लेते हैं, जिससे वह मात्र औपचारिक बनकर रह जाते हैं ! वास्तव में किसी को अपने कुल देवी देवता के प्रति कोई रुचि ही नहीं होती है ! आपके घर परिवार में हमेशा कुल देवी देवता की पूजा होती है और घर के बुजुर्ग उनके बारे में भलीभाँति अवगत हैं ! आप कहेंगे हमें तो किसी ने कुलदेवता के बारे मे बताया ही नहीं ! तब मैं बताना चाहूँगा कि जैसे बिना किसी के बताये आप अपने माँ बाप की पहचान करने में कोई भूल नहीं कर सकते, वैसे ही यदि ध्यान देते तो कुल देवी देवता को भी पहचान जाते ! .           आपके घर में जब कोई शादी ब्याह या मांगलिक ...

मुख्य रत्न और उपरत्नों की सुची

सूर्य से लेकर केतु तक सभी नवग्रहों के लिए नौ मूल रत्न हैं - सूर्य के लिए माणिक्य, चंद्र का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, गुरु का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम, राहु का गोमेद एवं केतु का लहसुनिया रत्न ! समस्त पृथ्वी पर मूल रूप से प्राप्त होने वाले मात्र 21 रत्न हैं ! इन 21 रत्नों को नवग्रहों में बांटा गया है !  नवग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुद्ध, गुरु, शुक्र एवं शनि ,राहु एवं केतु हैं ! उसी के अनुसार हर ग्रह के तीन-तीन रत्न है ! किन्तु राहु और केतु ग्रह की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता न होने से इनकी गणना मूल ग्रहों में नहीं होती है और इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है ! इसलिए राहु और केतु को कोई रत्न प्राप्त नहीं है ! गणना में मूलतः 21 रत्न प्रमुख रूप से होते हैं ! " इसके अतिरिक्त इन  रत्नो के 21 उपरत्न भी हैं !" पृथ्वी पर उपलब्ध वास्तविक रत्नों की संख्या 21 तक ही सीमित है ! इसके पीछे भी बहुत बड़ा कारण है ! जिस प्रकार दैहिक, दैविक तथा भौतिक रूप से तीन तरह की व्याधियां तथा तीन प्रकार की उपलब्धियां होती हैं उसी प्रकार इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीन नाड़िया होती है ! इसी प्रकार एक-एक...